पूनम शुक्ला : मुख्य प्रबंध संपादक :
लोकसभा में हाल ही में राइट टू डिस्कनेक्ट बिल, 2025 बिल पेश किया गया, जिसका मकसद कर्मचारियों के लिए वर्क-लाइफ बैलेंस को बढ़ावा देना है। देश में करोड़ों कर्मचारी रोज ऑफिस, फैक्ट्री और संस्थानों में तय समय से अधिक काम करते हैं, लेकिन बहुतों को पता ही नहीं होता कि इसके बदले उन्हें कितना पैसा मिलना चाहिए।
लोकसभा में हाल ही में ‘राइट टू डिस्कनेक्ट बिल 2025’ (Right to Disconnect Bill 2025) नाम का एक निजी सदस्य विधेयक पेश किया गया है, जिसका मकसद कर्मचारियों को काम के घंटों के बाद कार्य से जुड़े कॉल्स या ईमेल का जवाब देने के लिये कानूनी रूप से बाध्य होने से बचाना है, ताकि वर्क लाइफ बैलेंस बनाया जा सके।इसमें काम के घंटे पूरे होने पर ओवरटाइम पैसे देने का भी प्रावधान है। लोकसभा मे यह बिल एनसीपी सांसद सुप्रिया सुले ने पेश किया।
फैक्ट्रियों में सामान्य कार्य समय 9 घंटे प्रतिदिन या 48 घंटे प्रति हफ्ते होता है। इससे ज्यादा काम होने पर इसे ओवरटाइम माना जाता है। भारत में ओवरटाइम का नियम मुख्य रूप से Factories Act 1948, Minimum Wages Act, और State Shops & Establishment Acts के तहत तय किए गए हैं। इन कानूनों के मुताबिक किसी भी कर्मचारी से रोजाना तय शिफ्ट के अलावा अतिरिक्त काम तभी लिया जा सकता है, जब कंपनी इसके लिए कानूनी दिशानिर्देशों का पालन करे।
भारत में लाखों कर्मचारी प्रतिदिन ओवरटाइम करते हैं, लेकिन बहुतों को इसका उचित भुगतान नहीं मिलता। कई जगह कर्मचारियों से 10–12 घंटे तक काम कराया जाता है, लेकिन वेतन वही मिलता है जो 8 घंटे के लिए तय है। यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि कोई कंपनी कर्मचारी पर दबाव डालकर ओवरटाइम नहीं करा सकती। महिला कर्मचारियों के लिए ओवरटाइम के नियम और अधिक सख्त हैं।
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