पूनम शुक्ला : मुख्य प्रबंध संपादक :
भारत में लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने वाले NGO यानी नॉन-गवर्नमेंटल ऑर्गेनाइजेशन ‘एजुकेट गर्ल्स’ को रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह पहला इंडियन ऑर्गेनाइजेशन है, जिसे यह प्रतिष्ठित पुरस्कार मिला है।
लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से ग्रेजुएट होने के बाद, सफीना ने पारंपरिक रास्ता अपनाया। सफीना जब 2005 में भारत वापस लौंट दिल्ली एयरपोर्ट पर लैंड हुईं,वहां से वह सीधा HRD मिनिस्ट्री गईं, उन्होंने वहां जाकर सबसे ज्यादा क्रिटिकल जेंडर गैप वाले सबसे पिछड़े एरिया के बारे में पूछा। सरकार ने लिस्ट दी जिसमें 650 डिस्ट्रिक्ट में से 26 जिलों की डिटेल्स थी, 26 में से 9 जिले राजस्थान के थे।उसके बाद वो राजस्थान गईं। जहां उन्हें स्टेट गवर्नमेंट ने पाली और जालौर दो जिलों के 25-25 स्कूलों की सूची दी। उन स्कूलों में जेंडर गैप सबसे ज्यादा था। सफीना ने इन्हीं 50 स्कूलों से अपना काम शुरू किया। और उसके बाद साल 2007 में ‘एजुकेट गर्ल्स’ नाम के NGO की शुरुआत की। अब उनका संगठन ‘एजुकेट गर्ल्स’ 4 राज्यों- मध्यप्रदेश, यूपी, बिहार और राजस्थान के 85 से ज्यादा जिलों के 30,000 से ज्यादा गांवों में काम कर रहा है। इससे 20 लाख से ज्यादा लड़कियों को फायदा हुआ है।
रेमन मैग्सेसे को एशिया का नोबेल पुरस्कार कहा जाता है। ‘एजुकेट गर्ल्स’ मैग्सेसे सम्मान पाने वाला पहला भारतीय NGO है। रेमन मैग्सेसे पुरस्कार को एशिया का नोबेल पुरस्कार माना जाता है। यह उन व्यक्तियों और संगठनों को दिया जाता है, जिन्होंने समाज के लिए निस्वार्थ सेवा की हो। 67वें रेमन मैग्सेसे पुरस्कार की घोषणा 31 अगस्त 2025 को हुई थी और औपचारिक समारोह 7 नवंबर, 2025 को मनीला (फिलीपींस) के मेट्रोपॉलिटन थिएटर में आयोजित हुआ। रेमन मैग्सेसे पुरस्कार समारोह के लिए पहुंची टीम में फील्ड कोऑर्डिनेटर्स, गर्ल्स वॉलंटियर और पहली पीढ़ी के लर्नर्स शामिल थे।
यह NGO ग्रामीण और शैक्षिक रूप से पिछड़े इलाकों में 5 से 14 साल की उम्र की लड़कियों की पहचान करता है और उन्हें स्कूलों में भर्ती करवाता है। शुरुवाती दिनों में उन्हें कोई फंड कहीं से नहीं मिला। उन्होंने अपने खर्चे से इस काम को शुरू किया। रिजल्ट्स सकारात्मक दिखने पर राजस्थान सरकार ने 500 स्कूलों में काम करने की परमिशन दी और 5% का सपोर्ट दिया। आगे जैसे-जैसे गवर्नमेंट का भरोसा बढ़ता गया उनका सपोर्ट भी बढ़ता गया। यह संस्था ना सिर्फ लड़कियों को स्कूल भेजती है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करती है कि वे स्कूल में जाती रहें और पढ़ाई पूरी करें। साथ ही, ‘लड़कियों को पढ़ाने की जरूरत नहीं’ जैसी रूढ़िवादी सोच को बदलने का भी काम करती है। “एजुकेट गर्ल्स” का अगला लक्ष्य- साल 2035 तक 1 करोड़ बालिकाओं से शिक्षित करना है।
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