नितेश भारद्वाज-सह संपादक: केकेपी न्यूज़:
मानवता व छद्दम गरीबी पर दरियादिली से आज प्रकृति गर्त में चलती जा रही है | हम सदैव गरीबों के हित व जन समुदाय के हित में खड़ा रहना अपना व समाज का कर्तव्य मानते हैं | लेकिन दूसरे पहलू को दरकिनार कर देते हैं | दरअसल दशकों से हरा भरा जंगल कटते रहे और लोग बाग गरीबी और गरीबों के नाम पर चुप रहे |

लेकिन जंगल काटने वाले लोग बहुत कुछ अमीर भी हुए और जो रोजमर्रा के लिए काटते थे वो आज भी गरीब के गरीब ही हैं बस जंगल कट गए | केवल सोनभद्र में प्रतिदिन दो से तीन ट्रक हरा पेड़ काटकर एक सप्ताह बाद उसे जलावनी लकड़ी के रूप में ग्रामीणों द्वारा बेंच दिया जाता है और इसे गरीबों की जरुरत समझ मानवता वश गंभीरता से नहीं लिया जाता है | इसी भावनानाओं के आड़ में बड़े माफिया भी खेल कर जाते हैं |

जिसका नतीजा है कि पिछले तीन दशक में सोनभद्र का जंगल अपना अस्तित्व बचाने का मोहताज है और आने वाले कुछ वर्षों में लगभग समाप्त सा हो जायेगा | इसके साथ ही सरकार की वन लगाने की योजना के अंतर्गत मिलने वाले धन का बंदरबांट का श्रेय भी इसी “जंगल काटो अभियान” को जा रहा है |
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