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कानून की नजर में अंतरधार्मिक लिव-इन रिलेशनशिप कोई अपराध नहीं।

पूनम शुक्ला: मुख्य प्रबंध संपादक :

सोनभद्र की युवती के मुस्लिम साथी की याचिका पर हाई कोर्ट ने सुनवाई की । इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मुद्दे पर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि कानून की नजर में अंतरधार्मिक लिव-इन रिलेशनशिप कोई अपराध नहीं।

यह याचिका एक युवती और सोनभद्र के उसके मुस्लिम साथी द्वारा दायर की गई थी। याचिकाकर्ताओं ने महिला के परिवार से उनके शांतिपूर्ण जीवन में हस्तक्षेप नहीं करने और उन्हें सुरक्षा उपलब्ध कराने का निर्देश जारी करने का अनुरोध किया था। याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, उन्होंने एक अंतरधार्मिक ‘लिव-इन’ संबंध में साथ रहने का निर्णय किया और उन्हें महिला के परिजनों से जान को खतरा है। याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, इसलिए उन्होंने पुलिस से संपर्क किया, लेकिन पुलिस ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया। जिसके बाद उन्होंने अदालत में यह याचिका दायर की।

न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह ने यह कहते हुए याचिका स्वीकार कर ली कि महज इसलिए कि याचिकाकर्ता एक अंतरधार्मिक संबंध में रह रहे हैं, वे भारत के संविधान के तहत अपने मौलिक अधिकारों से वंचित नहीं होंगे। न्यायाधीश ने कहा कि जाति, पंथ, लिंग या धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता है।  जस्टिस विवेक कुमार सिंह की बेंच ने साफ तौर पर कहा कि संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 के तहत अंतरधार्मिक जोड़ों का लिव-इन में रहना किसी भी कानून के तहत दंडनीय या प्रतिबंधित नहीं है। कानून इसे अपराध की श्रेणी में नहीं रखता है।

इस मामले की सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने ‘लिव-इन’ संबंध में रह रहे अलग-अलग धर्म के पुरुष और महिला की ओर से सुरक्षा की मांग स्वीकार किया है। साथ ही कहा है कि अंतरधार्मिक ‘लिव-इन’ संबंध किसी भी कानून के तहत निषिद्ध या अपराध नहीं है। 

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट किया है कि भारत का संविधान हर नागरिक को अपनी मर्जी से जीवन जीने का अधिकार देता है. कोर्ट ने कहा कि जब दो व्यक्ति बालिग हो जाते हैं, तो वे अपनी पसंद के किसी भी व्यक्ति के साथ रहने के लिए स्वतंत्र हैं। अदालत ने 18 मार्च, 2026 को दिए निर्णय में कहा कि एक निजी संबंध में हस्तक्षेप, दो व्यक्तियों की पसंद की स्वतंत्रता के अधिकार में गंभीर अतिक्रमण माना जाएगा।

अदालत ने कहा कि यदि याचिकाकर्ताओं को कोई नुकसान पहुंचाया जाता है तो वे पुलिस अधिकारियों से संपर्क करने के लिए स्वतंत्र हैं। अदालत ने पुलिस अधिकारियों को इस मामले की समीक्षा करने और आरोपों में कोई दम पाए जाने पर याचिकाकर्ताओं को सुरक्षा उपलब्ध कराने का निर्देश दिया।

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